30 नवंबर 2011 - 20:30

पहली मुहर्रम से शुरू हुआ अज़ादारी का सिलसिला तीसरे दिन भी अक़ीदत के साथ जारी रहा.....

हिन्दू-शिया भाईचारा मंच ने भी किया गोष्ठी का आयोजन

पहली मुहर्रम से शुरू हुआ अज़ादारी का सिलसिला तीसरे दिन भी अक़ीदत के साथ जारी रहा। इमामबाड़ा ग़ुफ़रॉन-मआब, लखनऊ में अपनी तीसरी मजलिस को सम्बोधित करते हुए मौलाना कल्बे जवाद ने मजलिस के उनवान, इस्लाम दीने इल्म और अक़्ल, के अन्तर्गत कहा कि आजकल दो चीज़ें फ़ैशन की तरह इस्तेमाल की जाती हैं, एक इल्म हासिल होते ही मज़हब से दूरी और दूसरा दौलत आने के बाद पर्दे से परहेज़। इमामबाड़ा अली नक़ी में हुई मजलिस को मौलाना तक़ी रज़ा ने सम्बोधित किया इसके बाद दोपहर में विक्टोरिया स्ट्रीट स्थित मदरसा नाज़मियां में मौलाना हमीदुल हसन ने इस्लाम और इन्सानियत के उनवान से मजलिस को ख़िताब करते हुए इमाम हुसैन की शहादत के बाद का मंज़र यान किया तो लोग अपने ऑसू न रोक सके। हिन्दू-शिया भाईचारा मंच की ओर से बशीरतगंज स्थित इमामबाड़ा किशनु ख़लीफ़ा में में एक गोष्ठी का आयोजन किया गया। गोष्ठी की अध्यक्षता राष्ट्रीय मुस्लिम मंच के अवध क्षेत्र संयोजक ख़ुर्शीद आग़ा एडवोकेट मे की। गोष्ठी में वक्ताओं ने कहा कि रसूले इस्लाम की ज़िन्दगी और वफ़ात के बाद हुई जंगों में हाशमी घराने ने अल्लाह के सच्चे दीन का दामन थामे रखा। वक्ताओं ने कहा कि हज़रत अली और इमामे हसन को ज़ालिमों ने धोखे से शहीद किया दबकि इमाम हुसैन ने अपने साथियों के साथ यज़ीदी लश्कर के सामने न झुकते हुए कर्बला के मैदान में अज़ीम क़ुर्बानी पेश की जो आज भी मानवतावादी लोगों के दिलों में रौशन है। ताज़िएदार सेवक संघ के अध्यक्ष हरीशचन्द्र धानुक ने कहा कि इमाम हुसैन की कर्बला में दी गई क़ुर्बानी के कारण ही वो आज भी करोड़ों लोगों के दिलों में ज़िन्दा हैं।

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